BARKATI NAAT COLLECTION

नात शरीफ़ कलेक्शन

नबी-ए-करीम ﷺ की शान में पेश है खूबसूरत नात शरीफ़ का संग्रह।

आक़ा का मीलाद आया

या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! या रसूलल्लाह ! या हबीबल्लाह ! सल्ला'अलैका या रसूलल्लाह ! वसल्लिम 'अलैका या हबीबल्लाह ! अहल-व्व-सहलन मरहबा, या रसूलल्लाह ! चारों-तरफ़ नूर छाया, आक़ा का मीलाद आया ख़ुशियों का पैग़ाम लाया, आक़ा का मीलाद आया
अल्लाह ! अल्लाह ! अल्लाह ! अल्लाह !
शम्स-ओ-क़मर और तारे, क्यूँ न हों ख़ुश आज सारे उनसे ही तो नूर पाया, आक़ा का मीलाद आया
अल्लाह ! अल्लाह ! अल्लाह ! अल्लाह !
ख़ुशियाँ मनाते हैं वोही, धूमें मचाते हैं वोही जिन पर हुवा उन का साया, आक़ा का मीलाद आया है शाद हर इक मुसलमाँ, करता है घर घर चराग़ाँ गलियों को भी जगमगाया, आक़ा का मीलाद आया मुख़्तार-ए-कुल माने जो उन्हें, नूरी-बशर जाने जो उन्हें ना'रा उसी ने लगाया, आक़ा का मीलाद आया जो आज महफ़िल में आए, मन की मुरादें वो पाए सब पर करम हो, ख़ुदाया ! आक़ा का मीलाद आया ग़ौस-उल-वरा और दाता ने, मेरे रज़ा और ख़्वाजा ने सब ने ही दिन ये मनाया, आक़ा का मीलाद आया ना'त-ए-नबी तुम सुनाओ, 'इश्क़-ए-नबी को बढ़ाओ हम को रज़ा ने सिखाया, आक़ा का मीलाद आया जिस को शजर जानते हैं, कहना हजर मानते हैं ऐसा नबी हम ने पाया, आक़ा का मीलाद आया दिल जगमगाने लगे हैं, सब मुस्कुराने लगे हैं इक कैफ़ सा आज छाया, आक़ा का मीलाद आया कर, ऐ 'उबैद! उन की मिदहत, तुझ पर ख़ुदा की हो रहमत तूने मुक़द्दर ये पाया, आक़ा का मीलाद आया
अल्लाह ! अल्लाह ! अल्लाह ! अल्लाह !
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वो मेरा नबी

वो जिस के लिए महफ़िल-ए-कौनैन सजी है फ़िरदौस-ए-बरीं जिस के वसीले से बनी है वो हाश्मी, मक्की, मदनी-उल-'अरबी है
वो मेरा नबी, मेरा नबी, मेरा नबी है
अल्लाह का फ़रमाँ, अलम् नश्रह़् लक स़द्रक मंसूब है जिस से, व-रफ़'अना लक ज़िक्रक जिस ज़ात का क़ुरआन में भी ज़िक्र-ए-जली है अहमद है, मुहम्मद है, वो ही ख़त्म-ए-रुसूल है मख़दूम-ओ-मुरब्बी है, वो ही वाली-ए-कुल है उस पर ही नज़र सारे ज़माने की लगी है व-श्शम्सुद्दुहा चेहरा-ए-अनवर की झलक है वलैल सजा गेसू-ए-हज़रत की लचक है 'आलम को ज़िया जिस के वसीले से मिली है मुज़म्मिल-ओ-यासीन व मुदद्स़्स़िर-ओ-त़ाहा क्या क्या नए अल्क़ाब से मौला ने पुकारा क्या शान है उस की, कि जो उम्मी-लक़बी है वो ज़ात कि जो मज़हर-ए-लौलाक-लमा है जो साहिब-ए-रफ़रफ़ शब-ए-मे'राज हुआ है असरा में इमामत जिसे नबियों की मिली है किस दर्जा ज़माने में थी मज़लूम ये औरत फिर जिस की बदौलत मिली इसे 'इज़्ज़त-ओ-रिफ़'अत वो मोहसिन-ओ-ग़म-ख़्वार हमारा ही नबी है
वो मेरा नबी, मेरा नबी, मेरा नबी है
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जश्न-ए-आमद-ए-रसूल

जश्न-ए-आमद-ए-रसूल, अल्लाह ही अल्लाह !
बीबी आमिना के फूल, अल्लाह ही अल्लाह !
जब कि सरकार तशरीफ़ लाने लगे हूर-ओ-ग़िल्माँ भी ख़ुशियाँ मनाने लगे हर तरफ़ नूर की रौशनी छा गई मुस्तफ़ा क्या मिले ज़िंदगी मिल गई ऐ हलीमा ! तेरी गोद में आ गए दोनों 'आलम के रसूल, अल्लाह ही अल्लाह ! चेहरा-ए-मुस्तफ़ा जब दिखाया गया झुक गए तारे और चाँद शर्मा गया आमिना देख कर मुस्कुराने लगीं हव्वा, मरियम भी ख़ुशियाँ मनाने लगीं आमिना बीबी सब से ये कहने लगीं दु'आ हो गई क़ुबूल, अल्लाह ही अल्लाह ! शादियाने ख़ुशी के बजाए गए शादी के नग़्मे सब को सुनाए गए हर तरफ़ शोर-ए-सल्ले-'अला हो गया आज पैदा हबीब-ए-ख़ुदा हो गया फिर तो जिब्रील ने भी ये ए'लाँ किया ये ख़ुदा के हैं रसूल, अल्लाह ही अल्लाह ! उन का साया ज़मीं पर न पाया गया नूर से नूर देखो जुदा न हुआ हम को, 'आबिद! नबी पर बड़ा नाज़ है क्या भला मेरे आक़ा का अंदाज़ है जिस ने रुख़ पर मली वो ज़िया पा गया अर्ज़-ए-तयबा ! तेरी धूल, अल्लाह ही अल्लाह !
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आमद-ए-शाह-ए-अरब

मोमिनो वक्त-ए-अदब है, आमद-ए-महबूब-ए-रब है जाये आदाब-ओ-तरब है, आमद-ए-शाह-ए-अरब है गुंचे चटके, फूल महके, शाख-ए-गुल पर मुर्ग चहके झूम जाओ तुम भी कहके, आमद-ए-शाह-ए-अरब है बज रहे हैं शादियाँने, बुत लगे कलमा सुनाने हर ज़बाँ पे हैं तराने, आमद-ए-शाह-ए-अरब है अब्र-ए-रहमत छा गया है, काबे पे झंडा गड़ा है बाब-ए-रहमत आज खुला है, आमद-ए-शाह-ए-अरब है आमना बीबी का जाया, बारहवीं तारीख आया सुब्ह-ए-सादिक़ ने सुनाया, सलावत-ुल्लाह अलैका
मरहबा... बोलो मरहबा, झूम कर बोलो मरहबा
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मरहबा या मुस्तफ़ा

मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
नसीब चमके हैं फ़र्शियों के, कि 'अर्श के चाँद आ रहे हैं झलक से जिन की फ़लक है रौशन, वो शम्स तशरीफ़ ला रहे हैं निसार तेरी चहल-पहल पे हज़ारों 'ईदें रबी-'उल-अव्वल सिवाए इब्लिस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं शब-ए-विलादत में सब मुसलमाँ, न क्यूँ करें जान-ओ-माल क़ुर्बां ! अबू लहब जैसे सख़्त क़ाफ़िर ख़ुशी में जब फ़ैज़ पा रहे हैं ज़माने भर में ये क़ा'इदा है कि जिस का खाना उसी का गाना तो ने'मतें जिन की खा रहे हैं, उन्हीं के हम गीत गा रहे हैं जो क़ब्र में उन को अपनी पाऊँ, पकड़ के दामन मचल ही जाऊँ जो दिल में रह के छुपे थे मुझ से, वो आज जल्वा दिखा रहे हैं मैं तेरे सदक़े, ज़मीन-ए-तयबा! फ़िदा न हो तुझ पे क्यूँ ज़माना कि जिन की ख़ातिर बने ज़माने, वो तुझ में आराम पा रहे हैं
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हर वक़्त तसव्वुर में मदीने की गली हो

हर वक़्त तसव्वुर में मदीने की गली हो और याद मुहम्मद की मेरे दिल में बसी हो दो सोज़-ए-बिलाल, आक़ा ! मिले दर्द रज़ा सा सरकार ! 'अता 'इश्क़-ए-उवैस-ए-क़रनी हो ऐ काश ! मैं बन जाऊँ मदीने के मुसाफ़िर फिर रोती हुई तयबा को बारात चली हो ऐ काश ! मदीने में मुझे मौत यूँ आए चौखट पे तेरी सर हो, मेरी रूह चली हो जब ले के चलो गोर-ए-ग़रीबाँ को जनाज़ा कुछ ख़ाक मदीने की मेरे मुँह पे सजी हो जिस वक़्त नकीरैन मेरी क़ब्र में आएँ उस वक़्त मेरे लब पे सजी ना'त-ए-नबी हो आक़ा का गदा हूँ, ऐ जहन्नम ! तू भी सुन ले वो कैसे जले जो कि ग़ुलाम-ए-मदनी हो आक़ा की शफ़ा'अत से तो जन्नत ही मिलेगी ऐ काश ! कि क़दमों में जगह उन के मिली हो अल्लाह की रहमत से तो जन्नत ही मिलेगी ऐ काश ! महल्ले में जगह उन के मिली हो अत्तार हमारा है, सर-ए-हश्र इसे, काश ! दस्त-ए-शह-ए-बतहा से यही चिठ्ठी मिली हो
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मुझे दर पे फिर बुलाना

मुझे दर पे फिर बुलाना, मदनी मदीने वाले! मय-ए-'इश्क़ भी पिलाना, मदनी मदीने वाले! मेरी आँख में समाना, मदनी मदीने वाले! बने दिल तेरा ठिकाना, मदनी मदीने वाले! तेरी जब भी दीद होगी, तभी मेरी 'ईद होगी मेरे ख़्वाब में तुम आना, मदनी मदीने वाले! मुझे सब सता रहे हैं, मेरी जान खा रहे हैं तुम्हीं हौसला बढ़ाना, मदनी मदीने वाले! मेरे सब 'अज़ीज़ छूटे, मेरे यार भी तो रूठे कहीं तुम न रूठ जाना, मदनी मदीने वाले! ये मरीज़ मर रहा है, तेरे हाथ में शिफ़ा है ऐ तबीब! जल्द आना, मदनी मदीने वाले! तेरी सादगी पे लाखों, तेरी 'आजिज़ी पे लाखों हों सलाम 'आजिज़ाना, मदनी मदीने वाले! मेरे वालिदैन महशर में गो भूल जाएँ, सरवर! मुझे तुम न भूल जाना, मदनी मदीने वाले! तेरी सुन्नतों पे चलकर, मेरी रूह जब निकलकर चले, तू गले लगाना, मदनी मदीने वाले! मेरी आने वाली नस्लें, तेरे 'इश्क़ ही में मचलें उन्हें नेक तुम बनाना, मदनी मदीने वाले! तेरा ग़म ही चाहे 'अत्तार, इसी में रहे गिरिफ़्तार ग़म-ए-माल से बचाना, मदनी मदीने वाले!
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ऐ सब्ज़ गुम्बद वाले

ऐ सब्ज़ गुम्बद वाले, मंज़ूर दुआ करना, जब वक़्त-ए-नज़ा आए, दीदार अता करना। ऐ नूर-ए-ख़ुदा आकर, आँखों में समा जाना, या दर पर बुला लेना, या ख़्वाब में आ जाना। ऐ पर्दानशीं दिल के, पर्दे में रहा करना, जब वक़्त-ए-नज़ा आए, दीदार अता करना। मैं क़ब्र अँधेरी में घबराऊँगा जब तन्हा, इमदाद मेरी करने, आ जाना मेरे आका। रोशन मेरी तुर्बत को, ऐ नूर-ए-ख़ुदा करना, जब वक़्त-ए-नज़ा आए, दीदार अता करना। मुजरिम हूँ जहाँ भर का, महशर में भरम रखना, रुस्वाए ज़माना हूँ, दामन में छुपा लेना। मकबूल दुआ मेरी, महबूब-ए-ख़ुदा करना, जब वक़्त-ए-नज़ा आए, दीदार अता करना। चेहरे से ज़िया पाई, इन चाँद सितारों ने, उस दर से शिफ़ा पाई, दुख-दर्द के मारों ने। आता है उन्हें साबिर, हर दुख की दवा करना, जब वक़्त-ए-नज़ा आए, दीदार अता करना।
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तैयबा के जाने वाले

तैयबा के जाने वाले जाकर बड़े अदब से मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म कहना शह-ए-अरब ﷺ से कहना कि शाह-ए-आलम, इक रंज-ओ-ग़म का मारा दोनों जहाँ में जिस का हैं आप ही सहारा हालात-ए-पुर-अलम से इस दम गुज़र रहा हूँ और काँपते लबों से फ़रियाद कर रहा हूँ बार-ए-गुनाह अपना है दोश पर उठाए कोई नहीं है ऐसा जो पूछने को आए भटका हुआ मुसाफ़िर मंज़िल को ढूँढता है तारीकियों में माह-ए-कामिल को ढूँढता है सीने में है अँधेरा, दिल है सियाह-ख़ाना ये है मेरी कहानी सरकार ﷺ को सुनाना कहना मेरे नबी ﷺ से, मह्रूम हूँ खुशी से सर पर इक अब्र-ए-ग़म है, अश्कों से आँख नम है पामाल-ए-ज़िंदगी हूँ, सरकार उम्मती हूँ उम्मत के रहनुमा हो, कुछ अर्ज़-ए-हाल सुन लो फ़रियाद कर रहा हूँ मैं दिल-फ़िगार कब से मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म कहना शह-ए-अरब ﷺ से कहना कि खा रहा हूँ मैं ठोकरें जहाँ में तुम ही बताओ आक़ा ﷺ जाऊँ भला कहाँ मैं महसूस कर रहा हूँ, दुनिया है एक धोखा मतलब के यार सब हैं, कोई नहीं किसी का किस को मैं अपना जानूँ, किस का मैं लूँ सहारा मुझ को तो मेरे आक़ा ﷺ है आसरा तुम्हारा तुम ही मेरी सुनोगे, तुम ही करम करोगे दोनों जहाँ में तुम ही, मेरा भरम रखोगे तुम को ख़ुदा की क़ुर्बत, हासिल है मेरे आक़ा ﷺ बिगड़ी मेरी बनाना, है काम आप ही का तुम हो शाह-ए-दोआलम, मैं इक नसीब-ए-बरहम तुम बेसहारा वालों के वाली, मैं बेनवा सवाली तुम आसियों का यारा, मैं गर्दिशों का मारा रहमत हो तुम सरापा, मैं पुतला इक ख़ता का हूँ शर्मसार अपने, आमाल के सबब से मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म कहना शह-ए-अरब ﷺ से
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हो करम, सरकार!

हो करम, सरकार ! अब तो हो गए ग़म बेशुमार जान-ओ-दिल तुम पर फ़िदा, ऐ दो जहाँ के ताजदार ! मैं अकेला और मसाइल ज़िंदगी के बेशुमार आप ही कुछ कीजिए ना, ऐ शह-ए-'आली-वक़ार ! याद आता है तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-का'बा मुझे और लिपटना मुल्तज़म से वालिहाना बार-बार जा रहा है क़ाफ़िला तयबा नगर रोता हुआ मैं रहा जाता हूँ तन्हा, ऐ हबीब-ए-किर्दगार ! जल्द फिर तुम लो बुला और सब्ज़-गुंबद दो दिखा हाज़िरी की आरज़ू ने कर दिया फिर बे-क़रार चूम कर ख़ाक-ए-मदीना झूमता फिरता था मैं याद आते हैं मदीने के मुझे लैल-ओ-नहार या रसूलल्लाह ! सुन लीजे मेरी फ़रियाद को कौन है जो कि सुने तेरे सिवा मेरी पुकार हाल पर मेरे करम की इक नज़र फ़रमाइए दिल मेरा ग़मगीन है, ऐ ग़म-ज़दों के ग़म-गुसार ! क़ाफ़िले वालो ! सुनो, याद आए तो मेरा सलाम 'अर्ज़ करना रोते रोते हो सके तो बार-बार ग़म-ज़दा यूँ ना हुआ होता 'उबैद-ए-क़ादरी इस बरस भी देखता गर सब्ज़-गुंबद की बहार
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बे-ख़ुद किए देते हैं

बे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबाना आ दिल में तुझे रख लूँ, ऐ जल्वा-ए-जानाना ! इतना तो करम करना, ऐ चश्म-ए-करीमाना ! जब जान लबों पर हो, तुम सामने आ जाना क्यूँ आँख मिलाई थी, क्यूँ आग लगाई थी अब रुख़ को छुपा बैठे कर के मुझे दीवाना जी चाहता है तोहफ़े में भेजूँ मैं उन्हें आँखें दर्शन का तो दर्शन हो, नज़राने का नज़राना क्या लुत्फ़ हो महशर में, क़दमों में गिरूँ उन के सरकार कहें देखो, दीवाना है दीवाना ! मैं होश-ओ-हवास अपने इस बात पे खो बैठा जब तू ने कहा हँस के, आया मेरा दीवाना पीने को तो पी लूँगा, पर 'अर्ज़ ज़रा सी है अजमेर का साक़ी हो, बग़दाद का मय-ख़ाना बेदम ! मेरी क़िस्मत में सजदे हैं इसी दर के छूटा है न छूटेगा मुझ से दर-ए-जानाना मा'लूम नहीं, बेदम ! मैं कौन हूँ और क्या हूँ यूँ अपनों में अपना हूँ, बेगानों में बेगाना
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ने'मतें बाँटता

ने'मतें बाँटता जिस सम्त वो ज़ीशान गया साथ ही मुंशी-ए-रहमत का क़लम-दान गया ले ख़बर जल्द कि ग़ैरों की तरफ़ ध्यान गया मेरे मौला मेरे आक़ा ! तेरे क़ुर्बान गया दिल है वो दिल जो तेरी याद से मा'मूर रहा सर है वो सर जो तेरे क़दमों पे क़ुर्बान गया उन्हें जाना, उन्हें माना, न रखा ग़ैर से काम लिल्लाहिल-हम्द मैं दुनिया से मुसलमान गया और तुम पर मेरे आक़ा की 'इनायत न सही नज्दियो ! कलमा पढ़ाने का भी एहसान गया आज ले उन की पनाह, आज मदद माँग उन से फिर न मानेंगे क़ियामत में अगर मान गया जान-ओ-दिल, होश-ओ-ख़िरद सब तो मदीने पहुँचे तुम नहीं चलते, रज़ा सारा तो सामान गया
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मेरी उल्फ़त मदीने से

मेरी उल्फ़त मदीने से यूँ ही नहीं, मेरे आक़ा का रौज़ा मदीने में है मैं मदीने की जानिब न कैसे खिंचूँ, मेरा दीन और दुनिया मदीने में है 'अर्श-ए-आ'ज़म से जिस की बड़ी शान है रौज़ा-ए-मुस्तफ़ा जिस की पहचान है जिस का हम-पल्ला कोई मुहल्ला नहीं एक ऐसा मुहल्ला मदीने में है फिर मुझे मौत का कोई ख़तरा न हो, मौत क्या ज़िंदगी की भी परवा न हो काश ! सरकार इक बार मुझ से कहें अब तेरा जीना-मरना मदीने में है सरवर-ए-दो-जहाँ से दु'आ है मेरी, हाँ ! ब-दो-चश्म-ए-तर इल्तिजा है मेरी उन की फ़ेहरिस्त में मेरा भी नाम हो, जिन का रोज़ आना-जाना मदीने में है जब नज़र सू-ए-तयबा रवाना हुई साथ दिल भी गया, साथ जाँ भी गई मैं, मुनीर! अब रहूँगा यहाँ किस लिए ? मेरा सारा असासा मदीने में है
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सरकार की बातें

आओ कि करें उन लब-ओ-रुख़्सार की बातें, सरकार की बातें महबूब-ए-ख़ुदा, पैकर-ए-अनवार की बातें, सरकार की बातें जब कोई नहीं, कोई नहीं, कोई सहारा, ग़म-ख़्वार हमारा हम क्यूँ न करें अपने ख़रीदार की बातें, सरकार की बातें हसनैन की हों, अकबर-ओ-असग़र की हों बातें, ज़हरा-ओ-'अली की हर रंग में हो सीरत-ओ-किरदार की बातें, सरकार की बातें ए काश कि महफ़िल हो अबू-बक्र-ओ-'उमर की, 'उस्मान-ओ-'अली की यारों से सुनें हम भी कभी यार की बातें, सरकार की बातें महबूब-ए-ख़ुदा नबियों के सरदार के जैसा, सरकार के जैसा है कौन भला अहमद-ए-मुख़्तार के जैसा, सरकार के जैसा क्या इस में अजब कह दिया सिदरा के मकीं ने, जिब्रील-ए-अमीं ने देखा न कोई सय्यिद-ए-अबरार के जैसा, सरकार के जैसा सिद्दीक़ हों, फ़ारूक़ हों, 'उस्मान-ए-ग़नी हों या मौला 'अली हों है यार कहाँ दुनिया में इन चार के जैसा, सरकार के जैसा वो मौला 'अली शेर-ए-ख़ुदा फ़ातेह-ए-ख़ैबर दामाद-ए-पयम्बर लाए तो कोई हैदर-ए-कर्रार के जैसा, सरकार के जैसा ऐ चाँद ! तेरा हुस्न-ओ-जमाल अपनी जगह है, बिलाल अपनी जगह है आया न कोई इन के ख़रीदार के जैसा, सरकार के जैसा ऐ बाग़-ए-इरम ! तेरी बहारों में नहीं है, हज़ारों में नहीं है तयबा के हसीं उन गुल-ओ-गुलज़ार के जैसा, सरकार के जैसा पलता है सदा आप के टुकड़ों पे ज़माना, हसनैन के नाना ! दरबार कहाँ आप के दरबार के जैसा, सरकार के जैसा गुलज़ार! कोई और हसीं हो तो बताओ, कहीं हो तो दिखाओ कौनैन में उस पैकर-ए-अनवार के जैसा, सरकार के जैसा
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सलाम

मौला या सल्लि व सल्लिम दाइमन अबदन
अला हबीबिका ख़ैरिल-ख़ल्कि कुल्लिहिमी
सहर का वक़्त था, मा'सूम कलियाँ मुस्कुराती थीं हवाएँ ख़ैर-मक़दम के तराने गुनगुनाती थीं अभी जिब्रील भी उतरे न थे का'बे के मिम्बर से कि इतने में सदा आई ये 'अब्दुल्लाह के घर से मुबारक हो ! शह-ए-हर-दो-सरा तशरीफ़ ले आए मुबारक हो ! मुहम्मद मुस्तफ़ा तशरीफ़ ले आए मुहम्मदुन सय्यिदुल-कौनेनि व-स्संक़लैन वलफ़रीक़ैनि मिन उर्बि-व्व-मिन अज-मी वो मुहम्मद फ़ख़्र-ए-आलम, बादशाह-ए-इंस-ओ-जॉँ सरवर-ए-कौनैन, सुल्तान-ए-अरब, शाह-ए-अजम एक दिन जिब्रील से कहने लगे शाह-ए-उमम तुम ने देखा है जहाँ, बतलाओ तो कैसे हैं हम? अर्ज़ की जिब्रील ने, ऐ शाह-ए-दीं ! ऐ मोहतरम ! आप का कोई मुमासिल ही नहीं रब की क़सम हुवल हबीबुल लज़ी तुर्जा शफ़ाअतुहू लिकुल्लि हौलिम मिनल अहवालि मुक़्तहमि सुम्मर-रिज़ा अन अबी बक्रिव-व अन उमरिन व अन अलीयिव-व अन उस्मान ज़िल करमि या रब्बि बिल-मुस्तफ़ा बल्लिग़ मक़ासिदना वग़फ़िर लना मा मज़ा या वासिअल-करमी
मौला या सल्लि व सल्लिम दाइमन अबदन
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नारा — सरकार की आमद

सरकार की आमद ————» मरहबा दिलदार की आमद ————» मरहबा मुख्तार की आमद ————» मरहबा ताहा की आमद ————» मरहबा यासीन की आमद ————» मरहबा मुज़म्मिल की आमद ————» मरहबा मुदस्सिर की आमद ————» मरहबा मोहसिन की आमद ————» मरहबा शहंशाह की आमद ————» मरहबा महबूब की आमद ————» मरहबा मदनी की आमद ————» मरहबा मक्की की आमद ————» मरहबा मोहम्मद की आमद ————» मरहबा अहमद की आमद ————» मरहबा हामिद की आमद ————» मरहबा महमूद की आमद ————» मरहबा बशीर की आमद ————» मरहबा नज़ीर की आमद ————» मरहबा शाहिद की आमद ————» मरहबा हादी की आमद ————» मरहबा शफी की आमद ————» मरहबा नबी की आमद ————» मरहबा रसूल की आमद ————» मरहबा उम्मी की आमद ————» मरहबा आमिना के लाल की आमद ————» मरहबा अब्दुल्लाह के प्यारे की आमद ————» मरहबा सोहने (सोने) की आमद ————» मरहबा
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